शनिवार, 20 अगस्त 2016

शानच्-प्रत्यय

!!!---: शानच्-प्रत्यय :---!!!
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बालको !!! इससे पूर्व हमने आपके लिए शतृ-प्रत्यय के बारे में बता दिया है । हमें आशा है कि आप सब उससे लाभान्वित हुए होंगे ।

आज हम आपको शानच्--प्रत्यय के बारे में बतायेंगे ।

(१.) शानच् प्रत्यय का "आन" शेष रहता है ।
शनैः वर्धमाना सा वैभवं प्राप्नोति ।

(२.) यह भी वर्त्तमानकालिक प्रत्यय है ।
प्रकाशमानैः नक्षत्रैः आकाशः दीव्यति ।
(प्रकाशमान नक्षत्रो से आकाश चमकता है ।)

(३.) इसका प्रयोग केवल आत्मनेपदी धातुओं के साथ ही होता है । उभयपदी धातुओं से शतृ और शानच् दोनों प्रत्यय होते हैं ।
कष्टानि सहमानाः वीराः कीर्तिं लभन्ते ।
उभयपदी--पच्---पचन्--शतृ । पचमानः--शानच् ।

(४.) शानच् प्रत्यय से युक्त शब्द विशेषण के रूप में होता है । इसका अभिप्राय यह है कि इसमें तीनों लिंगों का प्रयोग होता है । इसमें वही लिंग होगा जो विशेष्य में होगा ।
प्रयतमानः बालकः--पु.
प्रयतमाना बालिका--स्त्री
प्रयतमानम् पुष्पम् --नपुं.

(५.) वर्त्तमान काल में धातु से जो लट् होता है, उसके स्थान पर शतृऔर शानच् ये दो प्रत्यय होते हैं----लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे--३.२.१२४
उदा---कम्पमानेभ्य वृक्षेभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।

(५.) इन्हें सत् भी कहा जाता है---तौ सत्---३.२.१२७
उदा---शतृ--ब्राह्मणस्य कुर्वन् ।
शानच्---ब्राह्मणस्य कुर्वाणः ।

(६.) भविष्यत् काल में धातु से होने वाले लृट् प्रत्यय के स्थान में शतृ और शानच् विकल्प से होते हैं--लृटः सद्वा--३.३.१४
उदा---शतृ---करिष्यन्तं देवदत्तं पश्य ।
शानच्---करिष्यमाणं देवदत्तं पश्य ।

(७.) शानच् प्रत्यय की आत्मनेपद सञ्ज्ञा है--तङानावात्मनेपदम्---१.४.१००
जैसे---वन्दमानः स आशिषं लभते ।

(८.) भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि आदि गण तथा ण्यन्त--सन्नन्त धातुओं से जब "शानच्" (आन) प्रत्यय होगा, तब "आन" से पूर्व "मुक्" का आगम होगा । "मुक्" का "म्" शेष रहता है---"आने मुक्" ७.२.८२
जैसेः---पचमानः, मोदमानः, आदि ।

(९.) अदादि. और जुहोत्यादिगण की धातुओं के साथ सीधा-सीधा "आन" ही जोड देते हैं । जैसेः--सन्दिहान, व्याचक्षाणः, सञ्जिहानः ।

(१०.) "आस" धातु से परे "आन" के "आ" को "ई" होगा---"ईदासः"---७.२.८३ उदा---आसीनः, आसीना, आसीनम् ।

(११.) पुल्लिंग में इसका रूप "राम" के समान चलेगा । जैसे----
यतमानः, यतमानौ, यतमानाः

(१२.) स्त्रीलिंग में इसका रूप "रमा" के समान चलेगा । जैसे---
यतमाना, यतमाने, यतमानाः

(१३.) नपुंसकलिंग में "पुष्पम्" के समान इसका रूप चलेगा । जैसे---
यतमानम्, यतमाने, यतमानानि

(१४.) लृट् स्थानीय "शानच्" प्रत्ययान्त के रूप भी इसी प्रकार से चलेंगे । जैसेः--
पु.--यतिष्यमाणः, स्त्री--यतिष्यमाणा, नपुं---यतिष्यमाणम् ।

(१५.) "शानच्" प्रत्यय दो वाक्यों को जोडने का भी काम करता है । जैसे---
(क) दिलीपः गां सेवते । दिलीपः सिंहं पश्यति ।
इन दोनों वाक्यों को मिलाकर एक वाक्य बनेगा--
गाम् सेवमानः दिलीपः सिंहं पश्यति ।

(ख) सैनिकाः युध्यन्ते । सैनिकाः देशं रक्षन्ति ।
युधमानाः सैनिकाः देशं रक्षन्ति ।

(ग) पुत्रः मातापितरौ सेवते । सः स्वकर्त्तव्यं निर्वहति ।
पुत्रः मातापितरौ सेवमानः स्वकर्त्तव्यं निर्वहति ।

(घ) ते मोदन्ते । ते गायन्ति ।
मोदमानाः ते गायन्ति ।

(ङ) लताः कम्पन्ते । लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।
कम्पमानाभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।

(१६.) अभ्यास के लिए अन्य वाक्यः---
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(१.) प्रयतमानाः जनाः साफल्यम् आप्नुवन्ति ।
कोशिश करते हुए मनुष्य सफलता प्राप्त करता है ।

(२.) दीनान् सेवमानः छात्रः मोदते ।
गरीबों की सेवा करते हुए छात्र खुश होता है ।

(३.) पुरस्कारं लभमानः छात्रः प्रसन्नः भवति ।
पुरस्कार प्राप्त करते हुए छात्र खुश होता है ।

(४.) चित्रम् ईक्षमाना बालिका प्रसन्ना भवति ।
चित्र को देखती हुई बालिका खुश होती है ।

(५.) प्रार्थयमानम् भक्तं पश्य ।
प्रार्थना करते हुए भक्त को देखो ।

(६.) वन्दमानया बालिकया गीतः गीयते ।
वन्दना करती हुई बालिका के द्वारा गीत गाया जा रहा है ।

(७.) सेवमानाय छात्राय मोदकानि यच्छ ।
सेवा करते हुए छात्र को लड्डु दो ।

(८.) कम्पमानात् वृक्षात् पत्रानि पतन्ति ।
काँपते हुए वृक्ष से पत्ते गिर रहे हैं ।

(९.) यतमानानाम् अपि यदि कार्यं न सिध्यति , तदा विधिः बलवान् इति मन्तव्यम् ।
यत्न करते हुओं का भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता, तो भाग्य का दोष समझना चाहिए ।

(१०.) त्वयि भोजनं पक्ष्यमाणे भक्षयिष्यामः ।
जब तुम भोजन पका लोगे, तब खायेंगे ।

(११.) दीनान् बिभ्राणाः पुरुषाः सर्वेषां मानभाजनानि भवन्ति ।
अनाथों का पोषण करते हुए मनुष्य सबके आदर के पात्र होते हैं ।

(१२.) याचमानान् पुरुषान् न कश्चित् आद्रियते ।
माँगते हुए मनुष्यों का कोई आदर नहीं करता ।

(१३.) सत्यार्थप्रकाशं पापठ्यमानानां जनानां सत्यस्य बोधः जायते ।
बार-बार सत्यार्थप्रकाश पढते हुए मनुष्यों को सत्य का बोध हो जाता है ।

(१४.) अहं व्याख्यानं तु करिष्यामि, किन्तु मनिष्यमाणान् एव छात्रान् आमन्त्रय ।
मैं व्याख्यान तो दूँगा, किन्तु समझने वाले छात्रों को ही बुलाओ ।

(१५.) यजमानान् ब्रह्मचारिणः अवलोक्य एका माता मनसि व्यचीचरत्---अहमपि मत्सुतं गुरुकुले प्रवेशयिष्यामि ।
यज्ञ करते हुए ब्रह्मचारियों को देखकर एक माता ने मन में सोचा कि मैं भी अपने पुत्र को गुरुकुल में प्रविष्ट कराऊँगी ।
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